श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में नन्हे जीवन को मिली नई शुरुआत, डेढ़ साल बाद बच्चे ने पहली बार मां का दूध पिया
देहरादून। श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने दुर्लभ और जटिल शिशु शल्य चिकित्सा को सफलतापूर्वक अंजाम देकर एक डेढ़ वर्षीय बच्चे को नई जिंदगी दी है। जन्मजात बीमारी के कारण बच्चा जन्म से ही मां का दूध या सामान्य भोजन नहीं निगल पा रहा था, लेकिन सफल सर्जरी के बाद जब उसने […] The post श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में नन्हे जीवन को मिली नई राह, डेढ़ साल बाद बच्चे ने पहली बार पिया मां का दूध appeared first on Uttarakhand Broadcast.
श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में नन्हे जीवन को मिली नई शुरुआत, डेढ़ साल बाद बच्चे ने पहली बार मां का दूध पिया
देहरादून। श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल में चिकित्सकों की एक विशेषज्ञ टीम ने एक दुर्लभ और जटिल शिशु शल्य चिकित्सा को सफलतापूर्वक पूरा करके एक डेढ़ वर्षीय बच्चे की जिंदगी में नया उजाला ला दिया है। इस बच्चे को जन्मजात बीमारी के चलते, जन्म के समय से ही मां का दूध या सामान्य भोजन निगलने में कठिनाई हो रही थी। लेकिन, सफलतापूर्वक सर्जरी के बाद जब उसने पहली बार मां का दूध पिया, तो उस पल में उसके परिवार के आंखों में खुशी के आंसू थे। बच्चे के माता-पिता ने डॉक्टरों और अस्पताल के स्टाफ का दिल से धन्यवाद किया।
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, बच्चे को एक अत्यंत दुर्लभ जन्मजात बीमारी प्योर इसोफेगियल एट्रेसिया का सामना करना पड़ा। इस स्थिति में, भोजन नली (इसोफेगस) पूरी तरह से विकसित नहीं होती, और इसका ऊपरी तथा निचला हिस्सा आपस में जुड़ता नहीं। परिणामस्वरूप, बच्चे को खाना या दूध निगलने में कठिनाई होती है और उसके श्वसन नली में भोजन जाने का खतरा होता है।
विशेषज्ञ टीम की भूमिका
वरिष्ठ शिशु शल्य चिकित्सक डॉ. मधुकर मलेठा के नेतृत्व में बच्चे का सफल उपचार किया गया। पहले चरण में लगभग एक साल पहले बच्चे की सर्वाइकल इसोफेगोस्ट्रॉमी और गैस्ट्रोस्टॉमी की गई थी, ताकि उसे पोषण मिल सके।
इसके बाद, दूसरे चरण में डॉ. मलेठा और उनकी टीम ने सामान्य एनेस्थीसिया के तहत बच्चे का इसोफेगियल पुनर्निर्माण (गैस्ट्रिक पुल-अप तकनीक) को सफलतापूर्वक किया। इस जटिल सर्जरी में पेट (स्टमक) को ऊपरी दिशा में रखा गया, जिससे यह भोजन नली के रूप में कार्य करने लगा।
डॉ. मलेठा ने बताया कि इस प्रकार की सर्जरी में एनेस्थीसिया और शिशु रोग विभाग की विशेषज्ञ टीम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि टीमवर्क और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने ही इस जटिल सर्जरी को पूरी करने में मदद की।
भविष्य की दिशा
जन्मजात इसोफेगियल एट्रेसिया के लक्षणों में अत्यधिक लार आना, दूध पीते समय खांसी आना या सांस रुक जाना शामिल होते हैं। यदि समय पर जांच और सर्जरी की जाए, तो अधिकांश बच्चों को सामान्य जीवन जीने का अवसर मिल सकता है।
अस्पताल के चेयरमैन श्रीमहंत देवेन्द्र दास जी महाराज ने इस उपलब्धि के लिए डॉक्टरों और पूरी मेडिकल टीम को बधाई दी। इस सफल उपचार में डॉ. रोहित, डॉ. निगार, डॉ. गुंजन सहित नर्सिंग स्टाफ रत्ना, नेहा, श्रीति, प्रियंका और अमित का विशेष योगदान रहा।
कम शब्दों में कहें तो, अस्पताल में हुई इस सफल सर्जरी ने न केवल एक बच्चे की जिंदगी को बचाया है, बल्कि उसके परिवार की खुशियों को भी पुनर्जीवित किया है।
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