ग्लेशियल झीलों की सतत निगरानी के लिए वसुंधरा ताल में स्थापित हुआ अर्ली वॉर्निंग सिस्टम

DEHRADUN: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों के फटने से संभावित खतरे को भांपने और उनकी सतत निगरानी की दिशा में उत्तराखंड ने अहम उपलब्धि हासिल की है। आपदा प्रबंधनविभागकी ओर से चमोली जिले के वसुंधरा ताल में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगा दिया गया है। सिस्टम को फिट करके वैज्ञानिकों का दल वापस लौट चुका है। उच्च […] The post ग्लेशियल झीलों की  हो सकेगी सतत निगरानी, वसुंधरा ताल में सफलता से लगाया गया अर्ली वॉर्निंग सिस्टम appeared first on Devbhoomi Dialogue.

Oct 13, 2026 - 18:38
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ग्लेशियल झीलों की सतत निगरानी के लिए वसुंधरा ताल में स्थापित हुआ अर्ली वॉर्निंग सिस्टम

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DEHRADUN: उत्तराखंड ने ग्लेशियल झीलों के फटने के संभावित खतरे के पूर्वानुमान और लगातार निगरानी की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। चमोली जिले में स्थित वसुंधरा ताल में आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा सफलतापूर्वक एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस प्रणाली को फिट करके सफलता से कार्य पूरा कर लिया है।

कम शब्दों में कहें तो, उच्च हिमालयी क्षेत्र के दुर्गम भूभाग में ग्लेशियल झीलों की सुरक्षा के लिए यह अर्ली वॉर्निंग सिस्टम एक क्रांतिकारी कदम है, जिससे संभावित आपदाओं को समय पर भांपकर उन्हें नियंत्रित किया जा सकेगा।

ग्लेशियल झीलों की सुरक्षा में नया युग

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस प्रणाली की स्थापना की सफलताओं पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीकी अनुसंधान और संस्थागत समन्वय से हमारी आपदा प्रबंधन गतिविधियों को नई मजबूती मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने बताया कि वसुंधरा ताल में स्थापित अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आपदा जोखिम की निगरानी, समयबद्ध चेतावनी और समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रणाली स्थानीय निवासियों के लिए भी सुरक्षा का एक नया आयाम देने में सहायक होगी।

सिस्टम की विशेषताएँ

इस अर्ली वॉर्निंग प्रणाली में अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं, जो विभिन्न जलवायु डेटा को मापन करते हैं। इन उपकरणों के माध्यम से, हवा की गति, दिशा, वर्षा, सौर विकिरण, तापमान और वायुदाब जैसी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की जाएगी।

झील की गहराई और आकार

वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर, चौड़ाई 600 मीटर, और लंबाई 900 मीटर है। यह जानकारी केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के वैज्ञानिक एवं अभियान दल के प्रमुख डॉ. डीपी कानूनगो द्वारा साझा की गई है।

सेंसर्स की कार्यप्रणाली

इस प्रणाली में ऑल-इन-वन मौसम सेंसर, फ्लोटिंग एवं सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर, एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर जैसे उपकरण शामिल हैं। ये तात्कालिक भू-गतिविधियों और संभावित बर्फबारी के प्रभाव का सटीक पूर्वानुमान प्रदान करने में सक्षम हैं।

हर दो घंटे में, सेंसर से प्राप्त आंकड़े सीबीआरआई और उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) में स्थापित डैशबोर्ड पर भेजे जाएंगे, जिससे स्थिति की नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाएगी।

संचार तकनीक और बैकअप

सिस्टम के लिए इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे उच्च हिमालयी क्षेत्र में सामान्य मोबाइल नेटवर्क की कमी के बावजूद आंकड़ों का आदान-प्रदान संभव हो सके।

प्रणाली में सौर पैनल और बैटरी का उपयोग कर निर्बाध विद्युत आपूर्ति की गई है। ये बैटरी लगभग 10 दिनों तक बैकअप प्रदान करने में सक्षम हैं, ताकि आपातकालीन परिस्थितियों में भी प्रणाली का संचालन सुनिश्चित किया जा सके।

स्थानीय स्तर पर तैयार किया गया आधार

इस प्रणाली के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री से बनाए गए स्टील के मॉड्यूलर डिज़ाइन पर आधारित फाउंडेशन का उपयोग किया गया है। स्थानीय पत्थरों का प्रयोग फाउंडेशन को मजबूती प्रदान करने के लिए किया गया है।

जनता के लिए यह खबर अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे न केवल आपदा प्रबंधन में मदद मिलेगी, बल्कि स्थानीय निवासियों की सुरक्षा में भी बचाव की नई राहें खुलेंगी। उत्तराखंड सरकार का यह वैज्ञानिक प्रयास निश्चित रूप से देश के अन्य पहाड़ी राज्यों के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य करेगा।

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सादर, टीम द ओड नारी

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