जाति की पहचान रंग-रूप से नहीं! मद्रास HC का ऐतिहासिक निर्णय
अदालत ने तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिला स्तरीय विजिलेंस कमेटी के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीमा शुल्क विभाग के अधिकारी एम. रविकुमार के हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक माना गया था।
जाति की पहचान रंग-रूप से नहीं! मद्रास HC का ऐतिहासिक निर्णय
Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - The Odd Naari
कम शब्दों में कहें तो, मद्रास हाईकोर्ट ने रंग, कद-काठी और भाषा को जाति और धार्मिक पहचान का निर्धारण करने के लिए अपर्याप्त मानते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी व्यक्ति की जाति या धार्मिक पहचान का निर्धारण केवल उसके शारीरिक स्वरूप, कद-काठी, या बोलने की क्षमता के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई जिले में विजिलेंस कमेटी द्वारा पारित उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सीमा शुल्क विभाग के अधिकारी एम. रविकुमार के हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक माना गया था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने रविकुमार की जाति की अंतिम पुष्टि नहीं की है और मामले को नई जांच के लिए कमेटी के पास भेजा है।
रंग और कद के आधार पर किया गया भेद
इस मामले में, अधिकारियों ने रविकुमार और उनके परिवार के भौतिक विशेषताओं का हवाला दिया था, जिसमें गोरा रंग, लम्बा कद, और इंग्लिश बोलने की क्षमता शामिल थी। इन तत्वों को उनके धार्मिक दावे पर प्रश्न उठाने के लिए आधार बनाया गया। अदालत ने न्यायमूर्ति डी. भारथा चक्रवर्ती के नेतृत्व में निर्देश दिया कि किसी व्यक्ति का रंग, कद, या उसकी भाषा बोलने की क्षमता यह तय करने में सक्षम नहीं है कि वह किस धर्म को मानता है।
पृष्ठभूमि का संछिप्त विवरण
रविकुमार के अनुसार, उनके पिता हिंदू आदि द्रविड़ समुदाय से संबंधित थे, लेकिन 1960 में उन्होंने ईसाई धर्म अपनाया। 1966 में जन्मे रविकुमार ने बाद में दावा किया कि 1983 में वे फिर से हिंदू धर्म में लौट आए थे एवं इस आधार पर उन्हें 10 दिसंबर 1986 को प्रमाणपत्र प्रदान किया गया था, जिसके चलते उन्होंने सीमा शुल्क विभाग में कार्य किया और सहायक आयुक्त के पद तक पहुंचे।
रिटायरमेंट से पहले प्रमाणपत्र की जांच
रविकुमार की सेवानिवृत्ति 30 मई 2026 को नियत थी, इसी दौरान उनके प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता की जांच शुरू हुई। संबंधित विजिलेंस कमेटी ने 4 मई 2026 को उनके प्रमाणपत्र को गैर-प्रामाणिक मानते हुए एक नकारात्मक निर्णय दिया।
आधार के रूप में धार्मिक आचरण
रविकुमार ने अदालत में यह भी प्रस्तुत किया कि उन्होंने और उनके परिवार ने हिंदू धार्मिक परंपराओं का पालन किया है एवं अपने दावे के समर्थन में विवाह व अन्य धार्मिक आयोजनों की तस्वीरें पेश की हैं। उन्होंने न्यायालय को बताया कि उनके बच्चों के लिए भी हिंदू धार्मिक संस्कार संपन्न किए गए थे।
निष्कर्ष और कानूनी संदेश
मद्रास हाईकोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी टिप्पणी से यह पता चलता है कि किसी व्यक्ति की सामाजिक या धार्मिक पहचान का निर्धारण करने में शारीरिक विशेषताओं का आधार उचित नहीं है। हालांकि, अदालत ने रविकुमार के सामुदायिक प्रमाणपत्र को अंतिम रूप से स्वीकृति नहीं दी और इसे नई जांच के लिए भेजा है। यह निर्णय आगामी कानूनी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
अंत में, यह मसला न केवल रविकुमार के लिए बल्कि समाज के सभी वर्गों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश करता है, जो जाति और धर्म की पहचान के संदर्भ में रंग-रूप से परे जाकर सोचने के लिए प्रेरित करता है।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने संकेत दिया है कि भविष्य की जांच में ऐसे प्रमाण और परिस्थितियाँ सामने रखी जाएँगी जो किसी व्यक्ति के धार्मिक व्यवहार और उनकी वापसी को स्वीकार करने से संबंधित हों।
हमारे पाठकों को नवीनतम जानकारी और अद्यतनों के लिए The Odd Naari पर जाने की सलाह देते हैं।
आपका, टीम द ओड नारी, स्वाति राठी
What's Your Reaction?