23 साल बाद जेनी का बड़ा खुलासा, हरक सिंह रावत पर फिर गंभीर आरोप; बेटे के DNA टेस्ट की मांग

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 साल पुराने जेनी प्रकरण ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। शनिवार, 7 नवंबर को जेनी ने उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर वर्ष 2003 के घटनाक्रम को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म का आरोप दोहराते हुए कहा […] The post 23 साल बाद जेनी का बड़ा खुलासा, हरक सिंह रावत पर फिर गंभीर आरोप; बेटे के DNA टेस्ट की मांग appeared first on Uttarakhand Broadcast.

Nov 7, 2026 - 18:38
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23 साल बाद जेनी का बड़ा खुलासा, हरक सिंह रावत पर फिर गंभीर आरोप; बेटे के DNA टेस्ट की मांग
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 साल पुराने जेनी प्रकरण ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। शनिवार, 7 नवंबर को जेनी ने उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर वर्ष 2003 के घटनाक्रम को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म का आरोप दोहराते हुए कहा कि उनके साथ जो कुछ हुआ, उसकी पीड़ा वह आज तक झेल रही हैं। जेनी ने अपने 23 वर्षीय बेटे की पहचान का मुद्दा उठाते हुए कहा कि अब उनके बेटे को पिता का नाम और पहचान मिलनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने डीएनए जांच कराने की मांग भी की।

पत्रकार वार्ता के दौरान जेनी ने आरोप लगाया कि पुराने मामले के दौरान उन्हें मानसिक अस्पताल में रखा गया था। उनका दावा है कि उस समय उनकी मानसिक स्थिति बेहद खराब थी और इसी परिस्थिति में उनसे जबरन हस्ताक्षर कराए गए। उन्होंने यह भी कहा कि सीबीआई के अधिकारी उनसे मिलने केवल एक बार अस्पताल पहुंचे थे। जेनी ने सवाल उठाया कि उस समय उनकी स्थिति और उनके साथ हुई कथित घटनाओं की गंभीरता से जांच क्यों नहीं की गई।

जेनी ने कहा कि उनका बेटा पिछले 23 वर्षों से पिता की पहचान के बिना जीवन बिता रहा है। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि अब उनके बच्चे को उसका अधिकार और पिता का नाम मिलना चाहिए। उन्होंने इस मामले को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखते हुए पुराने घटनाक्रम की दोबारा पड़ताल करने की मांग उठाई।

2002 में देहरादून पहुंची थीं जेनी, 2003 में दिया था बच्चे को जन्म

जेनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2002 के अंतिम महीनों में हुई थी। उस समय असम निवासी इंदिरा देवी उर्फ जेनी दिसंबर 2002 में देहरादून पहुंची थीं। उत्तराखंड में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और हरक सिंह रावत मंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री थे।

जेनी ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलाने का भरोसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में उन्हें सरकारी आवास में रखा गया। 15 जून 2003 को उन्होंने देहरादून के सरकारी अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने हरक सिंह रावत को बच्चे का पिता बताते हुए यौन शोषण के आरोप लगाए।

18 जून 2003 को यह मामला विधानसभा में भी उठा। विपक्ष ने सरकार को घेरा और निष्पक्ष जांच की मांग की। विवाद बढ़ने के बाद हरक सिंह रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश करार देते हुए कहा था कि जब तक वह बेदाग साबित नहीं होते, तब तक विधानसभा में प्रवेश नहीं करेंगे।

सीबीआई जांच और डीएनए रिपोर्ट ने बदल दिया था मामले का रुख

मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सीबीआई जांच की संस्तुति की थी। जांच के दौरान जेनी और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए गए। 25 जुलाई 2003 को जेनी के बयान के आधार पर हरक सिंह रावत के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के डीएनए नमूनों की जांच कराई गई। सामने आई जानकारी के मुताबिक, दोनों के नमूनों का मिलान नहीं हुआ था। इसके बाद बच्चे के जैविक पिता होने के आरोप से हरक सिंह रावत को राहत मिलने की बात सामने आई। हरक सिंह रावत भी लगातार डीएनए रिपोर्ट को अपनी बेगुनाही का आधार बताते रहे हैं।

हालांकि, डीएनए जांच का निष्कर्ष जैविक पितृत्व से संबंधित था। इसे यौन शोषण से जुड़े प्रत्येक आरोप का स्वतः कानूनी निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इस मामले की पूरी स्थिति समझने के लिए जांच एजेंसी के मूल दस्तावेज और मुकदमे के अंतिम निस्तारण का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण है।

शिकायत वापस लेने के लिए 12 लाख रुपये की पेशकश का भी लगा था आरोप

वर्ष 2003 में ही इस प्रकरण से जुड़ा एक और विवाद सामने आया था। आरोप लगा था कि संरक्षण गृह में रहने के दौरान जेनी को शिकायत वापस लेने के लिए 12 लाख रुपये देने की पेशकश की गई थी।

इस मामले में संरक्षण गृह की एक कर्मचारी पर रकम और बिना हस्ताक्षर वाला शपथपत्र लेकर जेनी के पास पहुंचने का आरोप लगा था। तत्कालीन प्रशासनिक जांच में संरक्षण गृह की एक रसोइया सरोज के खिलाफ आरोप सही पाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद मामले की जांच रिपोर्ट सीबीआई को भेजने का निर्णय लिया गया था। हरक सिंह रावत ने उस समय इस तरह की रकम देने की पेशकश से खुद को अलग बताया था।

2016 में जेनी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत पर भी लगाए थे आरोप

करीब 13 साल बाद वर्ष 2016 में यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आया। इस दौरान जेनी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि उन्हें हरक सिंह रावत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए उकसाया गया था।

इसके बाद मुख्यमंत्री के निजी सचिव कमल सिंह रावत की शिकायत पर देहरादून में जेनी के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, झूठे साक्ष्य और रंगदारी से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस ने उनकी तलाश भी शुरू की थी, लेकिन उस समय उनका पता नहीं चल पाया था।

इस घटनाक्रम ने पुराने मामले को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया था। एक तरफ हरक सिंह रावत आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते रहे, तो दूसरी तरफ जेनी ने भी तत्कालीन सरकार के कुछ लोगों पर सवाल उठाए थे।

2026 में फिर गरमाई सियासत, नेताओं के बयानों से चर्चा में आया मामला

अक्टूबर और नवंबर 2026 में जेनी प्रकरण एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हल्द्वानी में इस पुराने मामले का जिक्र करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। इसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने भी बच्चे के पिता की पहचान को लेकर सवाल उठाए।

इस पर हरक सिंह रावत ने पलटवार करते हुए कहा कि उनका डीएनए परीक्षण पहले ही हो चुका है और रिपोर्ट में वह निर्दोष साबित हुए हैं। उन्होंने महेंद्र भट्ट को भी डीएनए जांच कराने की चुनौती दी। हरक सिंह रावत लगातार आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते हुए अपनी बेगुनाही दोहराते रहे हैं।

इसी बीच सोशल मीडिया पर जेनी के नाम से एक वीडियो भी सामने आया था। इसमें उन्होंने नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि इतने वर्षों में किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वर्ष 2003 में उनके साथ वास्तव में क्या हुआ था।

23 साल बाद फिर उठे सवाल, अब जवाबदेही किसकी?

सात नवंबर को पत्रकार वार्ता के दौरान जेनी के नए आरोपों ने पुराने प्रकरण को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मानसिक अस्पताल में रखे जाने, कथित तौर पर जबरन हस्ताक्षर कराने और जांच अधिकारियों के मिलने आने से जुड़े उनके दावों ने कई सवाल खड़े किए हैं।

क्या जेनी को वास्तव में मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया गया था? यदि हां, तो किन परिस्थितियों में और कितने समय तक? कथित तौर पर उनसे किन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए? क्या अस्पताल और जांच एजेंसी के रिकॉर्ड में इन घटनाओं से जुड़ी जानकारी मौजूद है? इन सवालों का जवाब पुराने दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच से ही मिल सकता है।

इसके साथ ही जेनी की ओर से बेटे के डीएनए परीक्षण की मांग ने भी बहस को नया मोड़ दिया है। 23 साल पुराने इस मामले में अब सबसे अहम सवाल एक बच्चे की पहचान और उससे जुड़े अधिकारों का है।

फिलहाल जेनी के नए आरोपों पर हरक सिंह रावत का पक्ष सामने आना बाकी है। पुराने मामले के आधिकारिक दस्तावेज, जांच की स्थिति और दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष पड़ताल ही पूरे घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट कर सकती है।

 

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