बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का महत्व

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Sep 3, 2026 - 00:38
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बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक और पारंपरिक ज्ञान का महत्व

बुग्याल संरक्षण के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण व पारंपरिक ज्ञान जरूरी

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखण्ड में बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग आवश्यक है। बुग्याल संरक्षण दिवस के अवसर पर आयोजित सेमिनार में विशेषज्ञों ने इस विषय पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।

देहरादून। हाल ही में मैती संस्था, यूकॉस्ट और हेस्को के संयुक्त तत्वावधान में बुग्याल संरक्षण दिवस के अवसर पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। इस सेमिनार का उद्देश्य उत्तराखण्ड के अल्पाइन घास के मैदानों (बुग्यालों) का संरक्षण करना था, जिसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पारंपरिक ज्ञान को एकीकृत करने पर जोर दिया गया।

कार्यक्रम की विशेषताएँ

कार्यक्रम का शुभारंभ मैती संस्था के संस्थापक पद्म श्री डॉ. कल्याण सिंह रावत के स्वागत संबोधन से हुआ। डॉ. रावत ने बुग्यालों को राज्य की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर बताते हुए उनके संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता पर जोर दिया।

सेमिनार में विशेषज्ञों द्वारा बुग्यालों के पारिस्थितिक महत्व और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों पर व्याख्यान प्रस्तुत किए गए। डॉ. जी. एस. रावत, पूर्व निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान ने अपने अनुभव साझा किए, जबकि डॉ. गजेन्द्र सिंह ने वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से बुग्यालों के अध्ययन की संभावनाएँ बताईं।

पारिस्थितिकी और संरक्षण की चुनौतियाँ

डॉ. जी. सी. एस. नेगी ने हिमालयी पर्यावरण और स्थानीय ज्ञान के संबंध में वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने बुग्यालों की पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों के ज्ञान को समझाने की आवश्यकता को रेखांकित किया।

इसके अलावा, यूकॉस्ट के डॉ. डी. पी. उनियाल ने संरक्षण में विज्ञान और तकनीकी दृष्टिकोण की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आधुनिक तकनीकों का उपयोग बुग्यालों के संरक्षण में सहायक हो सकता है।

स्थानीय समुदायों की भूमिका

कार्यक्रम में उत्तराखण्ड वन विभाग की अपर सचिव सुश्री कल्याणी ने बुग्यालों के संरक्षण के महत्व पर विचार करते हुए कहा कि वन विभाग द्वारा हर साल बुग्याल दिवस मनाया जाएगा, जिससे स्थानीय लोगों को जागरूक किया जा सके। मंत्री श्री सुबोध उनियाल ने इस पर ध्यान केंद्रित किया कि बुग्यालों के संरक्षण के लिए सरकार, स्थानीय समुदायों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रयासों का समुचित समन्वय आवश्यक है।

सम्मान और पुरस्कार

इस अवसर पर 'गिरि गंगा गौरव सम्मान' और 'मैती सम्मान' भी प्रदान किए गए। इस सम्मान से उन व्यक्तियों को नवाजा गया जिन्होंने पर्यावरण, विज्ञान, शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दिया।

कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि पद्म भूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। कुल मिलाकर, सेमिनार ने जोरदार रूप से यह साबित किया कि उत्तराखण्ड के बुग्याल केवल घास के मैदान नहीं, बल्कि जैव विविधता, जल स्रोतों और स्थानीय आजीविका के महत्वपूर्ण आधार हैं।

कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने सामूहिक रूप से इस बात पर जोर दिया कि बुग्यालों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय समुदायों की सहभागिता का समन्वय आवश्यक है।

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आपका धन्यवाद,

Team The Odd Naari, नाम: प्रियंका वर्मा

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