देश में POCSO के 2.45 लाख से अधिक मामले लंबित
उत्तर प्रदेश में सबसे खराब स्थिति; बच्चों को न्याय मिलने में हो रही देरी नई दिल्ली। देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में न्याय मिलने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए बनाए गए पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दर्ज 2.45 लाख से […]

उत्तर प्रदेश में सबसे खराब स्थिति; बच्चों को न्याय मिलने में हो रही देरी
नई दिल्ली। देश में बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में न्याय मिलने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए बनाए गए पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत दर्ज 2.45 लाख से अधिक मामले देश की विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इनमें उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहां करीब 65 हजार से 75 हजार मामलों में अब तक फैसला नहीं हो पाया है।
उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मामले लंबित
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में पॉक्सो के 65 हजार से 75 हजार मामले लंबित हैं। वहीं, केरल में 13 हजार से 18 हजार, राजस्थान में 12 हजार से 16 हजार और तमिलनाडु में 8 हजार से 11 हजार मामले अदालतों में विचाराधीन हैं।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों के निपटारे में कई राज्यों के सामने बड़ी चुनौती है। मामलों के लंबे समय तक लंबित रहने से पीड़ित बच्चों और उनके परिवारों को न्याय के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
संसद की स्थायी समिति ने की समीक्षा
संसद की गृह मामलों से संबंधित स्थायी समिति ने सोमवार को चार राज्यों में पॉक्सो मामलों की लंबित संख्या और विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों के प्रदर्शन की समीक्षा की।
बैठक में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु और केरल के वरिष्ठ प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों ने अपना पक्ष रखा। समिति के सदस्यों ने अधिकारियों से लंबित मामलों की स्थिति और उनके निपटारे में आ रही समस्याओं के बारे में जानकारी मांगी।
एक साल में सुनवाई पूरी करने का प्रावधान
पॉक्सो कानून की धारा 35 के तहत मुकदमे की सुनवाई एक वर्ष के भीतर पूरी करने का प्रावधान है। इसके लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (एफटीएससी) गठित की गई हैं, ताकि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों का तेजी से निपटारा किया जा सके।
हालांकि, बड़ी संख्या में मामले लंबित होना इस व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
बच्चों को समय पर न्याय मिलना जरूरी
बच्चों के खिलाफ यौन अपराध केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक चुनौती भी हैं। ऐसे मामलों में देरी पीड़ितों के मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी असर डाल सकती है।
जरूरत है कि विशेष अदालतों में पर्याप्त न्यायाधीश, सरकारी वकील और अन्य संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही जांच और सुनवाई की प्रक्रिया को तेज किया जाए, ताकि पीड़ित बच्चों को समय पर न्याय मिल सके।
न्याय में देरी किसी भी पीड़ित के लिए बड़ी पीड़ा होती है, लेकिन बच्चों से जुड़े मामलों में इसका महत्व और बढ़ जाता है। पॉक्सो कानून का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब दोषियों को समय पर सजा मिले और पीड़ित बच्चों को न्याय के लिए वर्षों इंतजार न करना पड़े।
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