उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी: नेपाल आपदा से मिले सबक

DEHRADUN: नेपाल तिब्बत सीमा पर विनाशकारी आपदा से सबक लेते हुए उत्तराखंड सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। पहाड़ी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न होने वाले संभावित खतरों को देखते हुए राज्य सरकार उनकी निगरानी एवं सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने के लिए आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह […] The post नेपाल आपदा से सबक लेंगे?  उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम appeared first on Devbhoomi Dialogue.

Aug 28, 2026 - 00:38
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उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी: नेपाल आपदा से मिले सबक
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी: नेपाल आपदा से मिले सबक

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी: नेपाल आपदा से मिले सबक

DEHRADUN: नेपाल तिब्बत सीमा पर हाल ही में आई विनाशकारी आपदा ने उत्तराखंड सरकार को संभलने का एक बड़ा मौका दिया है। राज्य सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए पहाड़ी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों की निगरानी और सुरक्षा के लिए आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस संदर्भ में कहा कि इस सिस्टम की स्थापना से पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षा को बढ़ाया जा सकेगा।

कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड सरकार ने ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए एक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का फैसला किया है, जो नेपाल में आई आपदा से प्रेरित है। अधिक अपडेट के लिए यहां क्लिक करें.

ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा

मुख्यमंत्री ने सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास, विनोद कुमार सुमन को निर्देश दिया है कि वह प्रदेश में स्थित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक सर्वे एवं वैज्ञानिक अध्ययन करवाएं। इस सर्वे में जल स्तर, झील के आकार में परिवर्तन, आसपास के भूभाग की स्थिति और संभावित जोखिम क्षेत्रों का नियमित मूल्यांकन किया जाएगा। इसके साथ ही, संभावित खतरों की स्थिति में सटीक और समय पर सूचना प्राप्त करने के लिए आधुनिक सेंसर और जल स्तर मापने वाले उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।

आपदा प्रबंधन के लिए उपाय

मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ग्लेशियर झीलों द्वारा उत्पन्न संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए सभी आवश्यक सुरक्षात्मक और जोखिम न्यूनीकरण उपायों को लागू करना आवश्यक है। इसके अंतर्गत संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर सुरक्षित निकासी मार्ग, संभावित प्रभावित क्षेत्रों का चिन्हांकन, संचार व्यवस्थाएं और स्थानीय स्तर पर चेतावनी तंत्र के माध्यम से राहत एवं बचाव की तैयारी को मजबूत किया जाएगा।

वर्तमान स्थिति और आने वाली कार्यवाही

आपदा प्रबंधन विभाग की बैठक में विशेष रूप से ग्लेशियर झीलों, नदियों के जल स्तर, संवेदनशीलस्थलों की निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया योजनाओं की समीक्षा की गई। जिलाधिकारियों को भी निर्देश दिए गए कि वे अपने जनपदों में संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों की नियमित निगरानी करें। यदि किसी असामान्य गतिविधि की पहचान होती है, तो उसकी सूचना तुरंत उच्च स्तर पर उपलब्ध कराइ जाए।

विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी कि उत्तराखण्ड में 13 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील श्रेणी में चिन्हित की गई हैं। इनमें से चार झीलों का सर्वेक्षण किया जा चुका है जबकि शेष झीलों का चरणबद्ध तरीके से अध्ययन जारी रहेगा। आने वाले दिनों में चमोली जनपद के सरस्वती ताल और उत्तरकाशी जनपद के केदारताल का सर्वेक्षण किया जाएगा। इस सर्वेक्षण में झीलों की वर्तमान स्थिति, जल स्तर और संभावित खतरे के कारकों का अध्ययन किया जाएगा।

भविष्य की तैयारी

सचिव सुमन ने बताया कि ग्लेशियर झीलों की निगरानी के साथ-साथ एक व्यापक प्रणाली विकसित की जा रही है जो संभावित खतरे की स्थिति में चेतावनी देने से शुरू होकर राहत और बचाव कार्यों तक कार्य करेगी। इसमें संवेदनशील झीलों की निरंतर निगरानी, अत्याधुनिक सेंसर और अर्ली वार्निंग उपकरणों की स्थापना, रियल टाइम डेटा प्राप्त करने की व्यवस्था और आवश्यकतानुसार उपकरणों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा।

इन सभी कदमों के माध्यम से उत्तराखंड सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जो भी जोखिम है, उस पर समय रहते नियंत्रित किया जा सके। यह न केवल उन स्थानों के लिए, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।

सही दिशा में उठाए गए यह कदम राज्य के लिए एक नया मोड़ साबित हो सकते हैं, जिससे संभावित आपदाओं के प्रभाव को कम किया जा सकेगा। हम सभी को इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और ग्लेशियर झीलों की सुरक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए।

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सादर,
टीम द ओड नारी

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