जौनसारी ST का सच क्या? 1967 के आदेश से 2003 की फाइल तक, पहचान पर बड़ा सवाल!
1967 के राष्ट्रपति आदेश में ‘Jannsari’ नाम दर्ज, 2003 में केंद्र ने Jaunsari को बताया ‘क्षेत्रीय शब्द’; 2025 में हाईकोर्ट ने समुदाय और क्षेत्र की पहचान के अंतर पर की महत्वपूर्ण टिप्पणी। चार अहम सरकारी दस्तावेज अब भी जांच के केंद्र में। रिपोर्ट: नीरज उत्तराखंडी देहरादून, 19 अक्टूबर 2026। उत्तराखंड में जौनसारी अनुसूचित जनजाति (ST) […] The post जौनसारी ST का सच क्या? 1967 के आदेश से 2003 की फाइल तक, पहचान पर बड़ा सवाल! appeared first on Uttarakhand Broadcast.
1967 के राष्ट्रपति आदेश में ‘Jannsari’ नाम दर्ज, 2003 में केंद्र ने Jaunsari को बताया ‘क्षेत्रीय शब्द’; 2025 में हाईकोर्ट ने समुदाय और क्षेत्र की पहचान के अंतर पर की महत्वपूर्ण टिप्पणी। चार अहम सरकारी दस्तावेज अब भी जांच के केंद्र में।
रिपोर्ट: नीरज उत्तराखंडी
देहरादून, 19 अक्टूबर 2026। उत्तराखंड में जौनसारी अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यह मामला केवल जाति प्रमाणपत्र जारी करने या आरक्षण का लाभ देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जनजातीय पहचान, क्षेत्रीय निवास, संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी दस्तावेजों की व्याख्या जैसे महत्वपूर्ण सवाल जुड़े हैं।
इस पूरे विवाद का सबसे अहम प्रश्न यह है कि 24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश में ‘जौनसारी’ को एक जनजातीय समुदाय के रूप में सूचीबद्ध किया गया था या जौनसार-बावर क्षेत्र के निवासियों को क्षेत्रीय आधार पर अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की व्यवस्था की गई थी?
उपलब्ध दस्तावेजों में इस सवाल के अलग-अलग पहलू सामने आते हैं। वर्ष 1965 की लोकुर समिति की रिपोर्ट में जौनसारी को जनजातीय समूह बताया गया। 1967 के राष्ट्रपति आदेश में ‘Jannsari’ नाम दर्ज हुआ। वहीं, 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में दिए गए केंद्र सरकार के लिखित उत्तर में Jaunsari को ‘territorial term’ यानी क्षेत्रीय शब्द बताया गया। इसके बाद विभिन्न आयोगों की रिपोर्टों और न्यायालयी कार्यवाहियों में भी इस मुद्दे पर सवाल उठे।
वर्ष 2025 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के सामने आए मामले ने भी समुदाय की पहचान और केवल किसी क्षेत्र में निवास करने के आधार पर ST दर्जे का दावा करने के बीच के अंतर को रेखांकित किया।
1967 का राष्ट्रपति आदेश: विवाद की जड़ कहां है?
24 जून 1967 को राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 342(1) के तहत Constitution (Scheduled Tribes) (Uttar Pradesh) Order, 1967 जारी किया था। इस आदेश की अनुसूची में उत्तर प्रदेश के लिए अनुसूचित जनजातियों के नाम दर्ज किए गए थे।
इस सूची में क्रम संख्या तीन पर ‘Jannsari’ नाम दर्ज है। इसी सूची में भोटिया, बुक्सा, राजी और थारू समुदायों के नाम भी शामिल हैं।
आदेश की प्रस्तावना में अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करते हुए ‘tribes or tribal communities, or parts of, or groups within, tribes or tribal communities’ जैसी संवैधानिक भाषा का इस्तेमाल किया गया है।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उपलब्ध मूल आदेश में जौनसार-बावर क्षेत्र के प्रत्येक निवासी को स्वतः अनुसूचित जनजाति घोषित करने वाला स्पष्ट वाक्य नहीं मिलता।
यही बिंदु इस विवाद की संवैधानिक व्याख्या को महत्वपूर्ण बनाता है। हालांकि, आदेश में प्रयुक्त नाम, उसकी कानूनी व्याख्या और बाद में जारी किए गए प्रशासनिक निर्देशों को एक साथ पढ़े बिना अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
1965 की लोकुर समिति ने जौनसारी को बताया था जनजातीय समूह
राष्ट्रपति आदेश से पहले वर्ष 1965 में लोकुर समिति की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ‘Jaunsari’ का उल्लेख किया गया था।
रिपोर्ट में जौनसारी को ‘A polyandrous tribal group’ यानी बहुपति प्रथा वाले जनजातीय समूह के रूप में वर्णित किया गया। इसमें देहरादून, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी जिलों में इसके निवास का उल्लेख भी किया गया था।
रिपोर्ट में कुछ अपेक्षाकृत उन्नत सामाजिक समूहों, जैसे ब्राह्मण और राजपूत, को अलग किए जाने का भी जिक्र था।
यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 1967 के राष्ट्रपति आदेश से पहले की केंद्रीय समिति की रिपोर्ट में ‘Jaunsari’ को जनजातीय समूह के रूप में दर्ज किया गया था।
हालांकि, लोकुर समिति की रिपोर्ट अपने आप में संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत जारी अधिसूचना नहीं थी। इसलिए इसकी सामाजिक-प्रशासनिक टिप्पणियों और राष्ट्रपति आदेश के कानूनी प्रभाव को अलग-अलग समझना जरूरी है।
1969 में संसद तक पहुंचा था जौनसारी पहचान का मुद्दा
जौनसारी पहचान और विभिन्न समुदायों की अनुसूचित जनजाति सूची में स्थिति को लेकर विवाद 1969 में संसदीय समिति के सामने भी पहुंचा था।
Joint Committee on the Scheduled Castes and Scheduled Tribes Orders (Amendment) Bill की कार्यवाही में जौनसारी प्रतिनिधिमंडल और उससे जुड़े ज्ञापन का उल्लेख मिलता है।
संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, महाराजा मनबेंद्र शाह ने बताया था कि 12 अक्टूबर 1968 को लिखे गए उनके पत्र के आधार पर वे समिति के सामने उपस्थित हुए थे। उन्होंने यह भी बताया कि 4 जनवरी 1969 को जौनसारियों का एक प्रतिनिधिमंडल समिति के सामने आया था और उसने मौखिक साक्ष्य के साथ लिखित ज्ञापन प्रस्तुत किया था।
इससे स्पष्ट होता है कि जौनसारी पहचान का सवाल उस समय संसद की समिति के सामने औपचारिक रूप से उठाया गया था।
हालांकि, इस पड़ताल में उस मूल ज्ञापन की स्वतंत्र प्रति उपलब्ध नहीं हो सकी है। इसलिए उसमें रखी गई मांगों और तर्कों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मूल दस्तावेज का सामने आना जरूरी है।
अलग-अलग समुदायों की पहचान पर भी हुआ था विचार
1969 की संयुक्त समिति की रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ‘Jaunsari’ और ‘Khasa Jaunsari’ के उल्लेख के साथ विभिन्न समुदायों की अलग-अलग प्रविष्टियों पर विचार किया गया था।
इसमें बजगी, बढ़ई, चमार, चूरा, डोम, जोगी, कोली, कोल्टा, कुम्हार, लुहार, सुनार और तमोटा सहित अनेक समुदायों के नामों का उल्लेख मिलता है। साथ ही जौनसार-बावर, रवाईं और जौनपुर परगनों का क्षेत्रीय संदर्भ भी सामने आता है।
यह सामग्री बताती है कि उस समय जौनसार-बावर की सामाजिक संरचना और विभिन्न समुदायों की अलग पहचान का प्रश्न संसदीय विचार-विमर्श का हिस्सा था।
हालांकि, समिति की सिफारिश को वर्तमान संवैधानिक ST सूची का हिस्सा नहीं माना जा सकता, क्योंकि सिफारिश और लागू कानून के बीच अंतर होता है।
2003 का राज्यसभा जवाब, जिसने विवाद को दी नई दिशा
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में दिया गया केंद्र सरकार का लिखित उत्तर है।
तत्कालीन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. सत्यनारायण जटिया ने कोल्टा और बजगी समुदायों से संबंधित सवाल के जवाब में कहा था कि Jaunsari को ‘a territorial term encompassing all the residents of the area’ माना गया है।
इसका आशय था कि Jaunsari शब्द का इस्तेमाल उस क्षेत्र के निवासियों को समेटने वाले क्षेत्रीय शब्द के रूप में किया गया।
इसी आधार पर उत्तर में कहा गया कि जौनसार-बावर क्षेत्र के कोल्टा और बजगी समुदायों के व्यक्ति निर्धारित शर्तों के अधीन Jaunsar के नाम से अनुसूचित जनजाति का लाभ पाने के अधिकारी हो सकते हैं।
उत्तर में एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी दर्ज थी कि दावेदार या उसके माता-पिता 24 जून 1967 को जौनसार क्षेत्र के स्थायी निवासी रहे हों।
यही वह बिंदु है, जहां 1967 के राष्ट्रपति आदेश की समुदाय-केंद्रित भाषा और 2003 के उत्तर में सामने आई क्षेत्रीय व्याख्या के बीच सवाल पैदा होता है।
हालांकि, 2003 का उत्तर एक विशिष्ट संसदीय प्रश्न के संदर्भ में दिया गया था। इसलिए इसे बिना अतिरिक्त दस्तावेजों के जौनसार-बावर के हर निवासी पर लागू सार्वभौमिक नियम मान लेना उचित नहीं होगा।
24 जून 1967 की स्थायी निवास वाली शर्त कहां से आई?
2003 के जवाब में 24 जून 1967 को स्थायी निवासी होने की शर्त का उल्लेख तो है, लेकिन इस पड़ताल में अभी तक वह मूल सरकारी फाइल सामने नहीं आई है, जिसमें इस कसौटी को निर्धारित करने का आधार दर्ज हो।
इससे कई सवाल पैदा होते हैं।
- यह शर्त पहली बार किस सरकारी आदेश या मंत्रालयी निर्णय में तय की गई?
- क्या इसके पीछे कोई कानूनी राय या विभागीय नोटशीट थी?
- क्या यह व्यवस्था केवल कोल्टा और बजगी समुदायों से संबंधित प्रश्न तक सीमित थी?
- क्या बाद में इसे व्यापक रूप से जौनसारी ST प्रमाणपत्रों पर लागू किया गया?
इन सवालों का उत्तर मिलने के बाद ही 2003 के संसदीय जवाब की वास्तविक प्रशासनिक और कानूनी पृष्ठभूमि को पूरी तरह समझा जा सकेगा।
भूरिया आयोग ने भी उठाया था पहचान और प्रमाणपत्र का सवाल
2002-04 के दौरान गठित भूरिया आयोग की रिपोर्ट में उत्तराखंड के जनजातीय प्रतिनिधियों की ओर से अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और जौनसारी पहचान को लेकर आपत्तियों का उल्लेख मिलता है।
रिपोर्ट में जौनसारी की परिभाषा और जौनसार-बावर में 1967 की अधिसूचना के समय मौजूद समुदायों की पहचान स्पष्ट करने की आवश्यकता सामने आई।
यहां विवाद का मूल प्रश्न केवल क्षेत्र में निवास का नहीं, बल्कि अधिसूचित समुदाय की पहचान और प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंडों का भी था।
आयोग की रिपोर्ट इस बात का संकेत देती है कि प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया और Jaunsari शब्द की व्याख्या को लेकर लंबे समय से स्पष्टता की मांग होती रही है।
2008 की मिसरा आयोग रिपोर्ट में ‘लीगल इंटरप्रिटेशन’ का उल्लेख
राष्ट्रीय धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यक आयोग की 2008 की रिपोर्ट में भी अनुसूचित जनजाति सूची में क्षेत्रीय नामों के इस्तेमाल से पैदा होने वाली समस्याओं पर चर्चा की गई।
रिपोर्ट में जौनसार परगने और वहां रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि क्षेत्रीय नाम को समुदाय के नाम की तरह इस्तेमाल करने से अनुसूचित जनजाति की स्थिति को लेकर जटिलताएं पैदा हुईं।
रिपोर्ट में बाद की एक ‘legal interpretation’ का भी उल्लेख किया गया, जिसके कारण क्षेत्र के अन्य लोगों को ST लाभ मिलने की स्थिति बनने की बात सामने आई।
लेकिन इस रिपोर्ट में उस मूल कानूनी राय की पूरी पहचान उपलब्ध नहीं होती, जिसके आधार पर यह व्याख्या सामने आई थी।
इसलिए यह स्पष्ट होना बाकी है कि संबंधित राय किस विभाग या प्राधिकारी ने दी थी, उसकी तारीख क्या थी और वह किन समुदायों तथा परिस्थितियों पर लागू होती थी।
1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड में पांच ST समुदायों का उल्लेख
वर्ष 1991 के केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश के लिए पांच अनुसूचित जनजातियों—भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू—का उल्लेख मिलता है।
इस रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश सरकार के 21 अगस्त 1980 के पत्र संख्या 2276/26-3-80-4/51/80 का भी संदर्भ दिया गया था। साथ ही यह उल्लेख था कि अन्य संबंधित समुदाय मौजूदा ST सूची में शामिल नहीं थे।
यह दस्तावेज इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे 1991 के प्रशासनिक रिकॉर्ड में सूचीबद्ध समुदायों की स्थिति सामने आती है।
लेकिन 1980 के पत्र की मूल प्रति इस पड़ताल में उपलब्ध नहीं हुई है। ऐसे में उसके पूरे आशय, संबंधित समुदायों और प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।
2024 में उत्तराखंड सरकार ने केंद्र से उठाया नाम का मुद्दा
जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ‘Jannsari’ और ‘Jaunsari’ नामों के बीच अंतर है।
उत्तराखंड सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 4 दिसंबर 2024 को जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार को ‘Verification of Community Name Jaunsari as Scheduled in the Tribe List’ विषय पर पत्र भेजा था।
इस पत्र का संबंध अनुसूचित जनजाति सूची में दर्ज नाम और प्रमाणपत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले नाम के बीच अंतर से था। इस अंतर के कारण छात्रवृत्ति और अन्य केंद्रीय लाभों से संबंधित प्रक्रियाओं में समस्या आने की बात सामने आई थी।
राज्य सरकार ने Jaunsari नाम की पुष्टि और सूची में दर्ज ‘Jannsari’ नाम के संबंध में स्पष्टीकरण की आवश्यकता उठाई।
हालांकि, राष्ट्रपति के 1967 के आदेश में ‘Jannsari’ ही दर्ज है। इसलिए राज्य सरकार की ओर से नाम को टाइपोग्राफिकल त्रुटि मानने की व्याख्या को औपचारिक संवैधानिक संशोधन के समान नहीं माना जा सकता।
नाम के इस अंतर का अंतिम समाधान संबंधित संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार ही हो सकता है।
2025 में हाईकोर्ट ने क्या कहा?
2 मई 2025 के Itika Pande and Another v. State of Uttarakhand मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट के सामने जौनसारी ST प्रमाणपत्र और 1967 के राष्ट्रपति आदेश की व्याख्या का सवाल आया।
अदालत ने संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के संदर्भ में पांच अधिसूचित जनजातीय समुदायों—भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू—का उल्लेख किया।
आदेश में की गई महत्वपूर्ण टिप्पणी का सार यह था कि अनुसूचित जनजाति की स्थिति का निर्धारण अधिसूचित समुदाय से संबंधित होने के आधार पर किया जाता है।
इससे केवल किसी क्षेत्र में निवास करने के आधार पर स्वतः ST दर्जा मिलने के दावे पर सवाल खड़ा होता है।
हालांकि, न्यायालय के आदेश को 2003 के राज्यसभा उत्तर का औपचारिक निरस्तीकरण बताना सही नहीं होगा। दोनों दस्तावेज अलग-अलग संदर्भों में सामने आए हैं। उनके कानूनी प्रभाव को समझने के लिए संबंधित आदेशों की पूरी भाषा और मामले के तथ्यों को साथ पढ़ना आवश्यक है।
जौनसारी ST विवाद के प्रमुख दस्तावेज क्या संकेत देते हैं?
| वर्ष/दस्तावेज | प्रमुख तथ्य |
|---|---|
| 1965, लोकुर समिति | Jaunsari को जनजातीय समूह के रूप में दर्ज किया गया। |
| 24 जून 1967, राष्ट्रपति आदेश | उत्तर प्रदेश की ST सूची में ‘Jannsari’ नाम शामिल किया गया। |
| 1969, संसदीय संयुक्त समिति | जौनसारी और अन्य सामाजिक समुदायों की पहचान पर विचार हुआ। |
| 1991, केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड | पांच अधिसूचित ST समुदायों का उल्लेख किया गया। |
| 21 अप्रैल 2003, राज्यसभा उत्तर | Jaunsari को ‘territorial term’ बताया गया और कोल्टा-बजगी के लिए विशेष शर्त का उल्लेख हुआ। |
| 2004, भूरिया आयोग | जौनसारी पहचान और प्रमाणपत्र मानदंडों में स्पष्टता का मुद्दा सामने आया। |
| 2008, मिसरा आयोग | क्षेत्रीय नामकरण और ‘legal interpretation’ से जुड़ी विसंगतियों का उल्लेख हुआ। |
| 4 दिसंबर 2024, उत्तराखंड सरकार का पत्र | Jaunsari नाम के सत्यापन का विषय केंद्र के समक्ष उठाया गया। |
| 2 मई 2025, हाईकोर्ट का आदेश | अधिसूचित समुदाय और केवल क्षेत्र में निवास के बीच अंतर पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई। |
अब भी चार अहम दस्तावेजों की तलाश
जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद की पूरी पृष्ठभूमि समझने के लिए चार दस्तावेज विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
पहला—12 अक्टूबर 1968 का मनबेंद्र शाह का पत्र। संसदीय कार्यवाही में इसका उल्लेख मिलता है, लेकिन इसकी मूल प्रति की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।
दूसरा—4 जनवरी 1969 का जौनसारी प्रतिनिधिमंडल का ज्ञापन। संसदीय रिकॉर्ड इसके प्रस्तुत होने की पुष्टि करता है, लेकिन मूल ज्ञापन से ही प्रतिनिधिमंडल की मांगों और तर्कों की पूरी जानकारी मिल सकेगी।
तीसरा—21 अगस्त 1980 का उत्तर प्रदेश सरकार का पत्र। वर्ष 1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड में इसका संदर्भ मिलता है। मूल पत्र से यह समझने में मदद मिलेगी कि राज्य सरकार ने उस समय किन समुदायों और किन व्यवस्थाओं को लेकर अपना पक्ष रखा था।
चौथा—2003 के राज्यसभा उत्तर के पीछे की मंत्रालयी फाइल। इसमें विभागीय नोटशीट, संबंधित राज्य सरकार की रिपोर्ट, कानूनी राय और 24 जून 1967 की स्थायी निवास संबंधी शर्त का मूल आधार मिल सकता है।
इन दस्तावेजों के बिना ‘territorial term’ वाली व्याख्या की उत्पत्ति और उसके दायरे को लेकर सभी सवालों का अंतिम उत्तर देना कठिन है।
क्या जौनसार-बावर में रहने वाला हर व्यक्ति स्वतः ST है?
उपलब्ध 1967 के राष्ट्रपति आदेश में ऐसा कोई स्पष्ट वाक्य नहीं मिलता, जिसमें जौनसार-बावर के सभी निवासियों को स्वतः अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया हो।
क्या केंद्र सरकार ने 2003 में क्षेत्रीय व्याख्या दी थी?
हां। राज्यसभा में दिए गए लिखित उत्तर में Jaunsari को ‘territorial term’ बताया गया था। साथ ही कोल्टा और बजगी समुदायों के लिए निर्धारित शर्तों के अधीन ST लाभ की पात्रता का उल्लेख किया गया था।
क्या 2003 की व्याख्या मूल राष्ट्रपति आदेश में लिखी है?
नहीं। ‘Territorial term’ की यह भाषा 1967 के राष्ट्रपति आदेश में नहीं है। यह 2003 के संसदीय उत्तर में सामने आई थी।
क्या इस व्याख्या का मूल कानूनी आधार मिल गया है?
इस पड़ताल में संबंधित मूल मंत्रालयी फाइल या कानूनी राय उपलब्ध नहीं हुई है। 2008 की आयोग रिपोर्ट में ‘legal interpretation’ का उल्लेख मिलता है, लेकिन उसके मूल स्रोत की पूरी पहचान स्पष्ट नहीं होती।
निष्कर्ष: जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद में मूल सरकारी फाइलें होंगी निर्णायक
जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद को समझने के लिए दो अतियों से बचना जरूरी है। एक ओर, यह मान लेना कि जौनसार-बावर में रहने वाला हर व्यक्ति केवल निवास के आधार पर स्वतः ST है, उपलब्ध राष्ट्रपति आदेश की स्पष्ट भाषा से साबित नहीं होता। दूसरी ओर, 2003 के संसदीय उत्तर को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि उसमें केंद्र सरकार की तत्कालीन आधिकारिक व्याख्या दर्ज है।
विवाद का समाधान केवल ऐतिहासिक दावों या सामाजिक बहस से नहीं, बल्कि मूल सरकारी दस्तावेजों, संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के लागू आदेशों के आधार पर ही हो सकता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि 2003 में Jaunsari को ‘territorial term’ मानने का आधार क्या था? 24 जून 1967 की स्थायी निवास संबंधी शर्त किस प्रक्रिया के तहत तय की गई? और क्या वर्तमान में जौनसारी ST प्रमाणपत्र जारी करने के लिए पूरे उत्तराखंड में स्पष्ट, एकसमान और सार्वजनिक सत्यापन मानदंड लागू हैं?
जब तक इन सवालों से जुड़ी मूल फाइलें सामने नहीं आतीं, जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद की पूरी प्रशासनिक और कानूनी कहानी अधूरी रहेगी।
यह मामला केवल प्रमाणपत्र का नहीं, बल्कि संवैधानिक पहचान, सरकारी जवाबदेही और पारदर्शी प्रशासन का भी है।
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